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Friday, 20 July 2018

चातुर्मास ••• एक पावन परिवर्तन...


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🚩 चातुर्मास पर्वोत्सव 🚩

चा : चार गति का नाश करे

तु : तत्व की पहचान कराए

र्मा : मोह का नाश कराए

स : संयम की अभिलाषा जगाए



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चातुर्मास : जागरण का पर्व...

हर जैनी करता है इन अनमोल घड़ियों का इंतजार,
 गुरु भगवंतों के सानिध्य में बीते चातुर्मास बार-बार।

 ज्ञान दर्शन चरित्र तप का लगता रहे मेला, 
 दौड़-दौड़ कर के आए मंदिर छोड़ संसार का झमेला।

 गुरु भगवंतों के मुखारविंद से सुनने मिले जिनवाणी,
 मनुष्य भव पाकर बड़े हमारी पुण्य वाणी।

 सम्यक ज्ञान रूपी जोत को करें हम प्रकाशित,
 जैन धर्म के तत्व ज्ञान से होते रहे संस्कारित।

 सम्यक दर्शन तो मोक्ष पाने तक देगा हमें साथ,
 जिन उपदेशों को अब हमें करना है आत्मसात।

 सम्यक चारित्र दृढ करेगा हमारा संकल्प,
 दान, शील, तप,भाव हैं बहुत सारे विकल्प।

 सम्यक तप से करेंगे हम कर्मों को चकनाचूर,
मोक्ष रूपी राह ना होगी अब हमसे दूर।

 गुरु भगवंतों की कृपा से लूटेंगे सद्गुणों का खजाना,
 महका देंगे हम हमारा जिन रूपी घराना।

 हर क्षेत्र में गूंजेंगे अब भगवान महावीर के नारे,
 चातुर्मास सफल बनाने में तन मन लगा देंगे सारे।


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 चातुर्मास के इन दिनों को हमें सार्थक बनाना है, जिनवाणी से अपना जीवन ओतप्रोत बनाना है। चातुर्मास की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं। आपका चातुर्मास धर्ममय बने यही वीर प्रभु के चरणों में प्रार्थना करते हैं...

🙏 जय जिनेंद्र 🙏

🚩🔔 जय महावीर 🔔🚩

🚩🔔🕉 जैनम् जयतु शासनम् 🕉🔔🚩












Monday, 16 July 2018

बहुत सुंदर पंक्तियाँ... सहज चिंतन प्रभु दर पर...

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 सहज चिंतन प्रभु दर पर...

 अद्भुत बात यहाँ चलती है,
 मुक्ति पुरी का द्वार है।
 भावी सिद्ध यहां पर बैठे 
करते तत्व विचार हैं।

 अनंत भवों के पुण्य को,
 जब मैंने प्रभु खपाया है।
 तब जाकर के यह चिंतामणि,
 नर भव मैंने पाया है।

 बचपन में तो ज्ञान नहीं था,
 लगा रहा मैं खेलों में।
 यौवन में आया तो खो गया,
 विषयों के मेलों में।

 कहते हैं सब वृद्ध अवस्था,
 में धर्म ध्यान करो तुम।
 शक्ति रहे न,आयु बचे न,
 ध्यान रहे परिजन में गुम।

  अरे प्रभु तब क्या कल्याण,
 करूंगा मैं निज आतम का।
 अभी समय है योवन का,
 पुरूषार्थ करूं परमातम का।

 ज्यों धन आता क्यों विषयों में,
 उलझा जाता मेरा मन।
 माटी और कागज में खोया,
 मैंने अपना मानुष तन।

 अरे प्रभु अब चेत रहा हूँ,
अब ना मुझे सोना है कभी।
 निज धन बिन मैं बहुत रुला हूँ,
अब ना मुझे रोना है कभी।

 जीवन मेरा आयु कर्म,
 धर्म पुण्य पाप आधीन है।
 क्षमा करो फिर सब जीवों की,
 सब स्वतंत्र स्वाधीन है।

 मान करूं कि यह धन-संपत्ति,
 मैंने यहां कमाया है।
 जरा विचार इस भाव से मैंने,
 नरकों के कोड़े खाया है।

 विषयों की इस चकाचौंध में,
 होये पदार्थ इष्ट भाषित।
नहीं इष्ट व अनिष्ट जगत में,
 व्यर्थ कल्पना पर आश्रित।

 मैं अखंड अविनाशी "ज्ञाता",
 अब ना पर में भ्रमाऊँगा।
मेरे अपने सिद्धशिला में,
अब मुक्तिपुरी ही जाऊँगा।

प्रथम देखूँ निज आत्मा,
 दूजा देखूं प्रभु तोय।
अन्य कुछ देखूँ नहीं,
 नहीं तो मन ये मैला होये।।


🚩जैनम जयतु शासनम् 🚩

🚩🙏 वंदे श्री वीरशासनम् 🙏🚩

🙏🌷 जय महावीर 🌷🙏 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏